पागल फौजी

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The Strange Story

किराने की दुकान देखते ही मैंने अपनी कार को ब्रेक लगाए और कार से नीचे उतर कर आया ; दुकानदार से पूछा कि “भाई साहब यहां पर कोई किराए का मकान मकान मिलेगा ?” दरअसल हुआ यूं कि मुझे उस कॉलोनी में घर बनाना था और घर बनाने के लिए मुझे किराए का मकान चाहिए था। तो उन्होंने एक मकान की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह देखिए वह एक मकान खाली है ।वह एक मकान किराए के लिए उपलब्ध है, मगर अभी वह खाली नहीं है । उसमें जो किराएदार रह रहे हैं वह तो करीब 3-4 दिन बाद उसे खाली कर देंगे तो आप वहां से पता कर सकते हैं मैंने कहा इसका मकान मालिक कौन है ? तो उन्होंने वहां खड़े अपने साथी की ओर व्यंग से मुस्कुराते हुए कहा कि “एक फौजी हैं ।” मैंने कहा कि आप मुस्कुरा क्यों रहे हो? उन्होंने कुछ छुपाते हुए जवाब दिया, “नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।”

मैं वहां से चला और मैंने   उस मकान का दरवाजा खटखटाया तो एक अधेड़ महिला ने दरवाजा खोलते हुए मुझसे पूछा, “कहिए ?” मैंने निवेदन किया कि “आंटी जी मैं यहां पर मकान बनवा रहा हूं तो मुझे किराए का मकान चाहिए था और मैंने सुना है कि आप मकान खाली करने वाले हैं” उन्होंने जवाब दिया कि हम एक हफ्ते में इस मकान को खाली करने वाले हैं। “क्या मैं मकान देख सकता हूं” मैंने उनसे विनम्रता पूर्वक निवेदन किया।  उन्होंने उस मकान की कमियां बताते हुए पूरा मकान  दिखाया। मैंने हिचकिचाते हुए पूछा कि “यह जो फौजी साहब हैं, जो कि इस मकान के मालिक हैं, वह कैसे हैं ?”  “ठीक ही हैं” वह थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली। थोड़ी गड़बड़ महसूस हुई। मैं उनका अभिवादन करके वहां से चला प़डा और मुझे थोड़ी दूर चलने पर मुझे एक और जानकार मिल गए जो उस कॉलोनी में ही रह रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि यह मकान किसका है और इस मकान के मालिक का नाम सुनकर लोग मुस्कुराते क्यों हैं?  कुछ  गड़बड़ है क्या? “भाईसाहब किसी को कहना नहीं, यहां के जो फौजी है ना वह पागल हो गए थे। वह कभी चीजें उठा उठा कर मारते हैं कभी भी झगड़ा कर लेते हैं वे मारने को दौड़ते हैं। बडे ही खतरनाक हैं।” मैंने वह चैप्टर लगभग बंद ही समझ लिया था, परंतु मुझे मकान की तलाश के दौरान एक और व्यक्ति मिले जिन्होंने कहा कि “वह पहले पागल थे,अब नहीं है।

चलो जो भी हो, मैंने कहीं और मकान ले लिया था और मकान बना मैं उसमें रहने लगा । लगभग एक साल बाद हमारी कॉलोनी में रहने वाले एक पड़ोसी मेरे घर पधारे , जिनसे दो तीन बार हाय हेलो हो चुकी थी ।पड़ोसी के नाते मुझे इतना ही  मालूम था कि वे  यहां पर एक छोटा इंस्टिट्यूट चला रहे हैं । उनसे बात हुई और बातचीत के दौरान पता चला कि, अरे यह तो वही फौजी हैं, जिन्हें पागल कहा जा रहा था और जिनका मकान में किराए लेने वाला था। परंतु वह तो इतने स्थिर शांत गंभीर परमानंद स्थिति में थे कि मैं उलझन में पड़ गया और आखिर हिम्मत करते हुए मैंने उनसे यह पूछ लिया कि “भाई साहब बुरा मत मानिएगा अगर मैं आपसे एक बात पूछूं”, तो उन्होंने बड़े प्यार से कहा “पूछिए, ऐसी कोई बात नहीं है ।” “भाई साहब वह मुख्य रोड पर किराए की किराने की दुकान के पास आपका ही मकान है?” उन्होंने भांप लिया वे थोड़ा बहुत मुस्कुराने लगे। मैंने सकुचाते हुए हिम्मत बांधते हुए अपनी बात को जारी रखा ।

“भाई साहब जब मैं किराए के लिए मकान ढूंढ रहा था, उस दौरान मुझे दो-तीन लोगों ने यह कहा कि आप पागल हैं। जबकि आप तो बड़े सभ्य सुसंस्कृत धीर गंभीर शांत चित्र वाले व्यक्ति दिखाई देते हैं।” उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “कि बात बिल्कुल सही है कि मैं पहले पागल हो गया था और सही होने की कोई संभावना नहीं थी। परंतु चमत्कार वश मैं सही हो गया और आज आपके सामने हूँ ।” मेरे चेहरे पर उत्सुकता को भांप कर उन्होंने स्वत: ही अपनी सुनाने शुरू कर दी। मैं उनकी आंखों कि अद्भुत चमक और चेहरे पर आभामंडल को अपलक निहार रहा था और उनकी ओजस्वी वाणी मुझे मंत्रमुग्ध करती जा रहीं थी । अपने अतीत की गहराइयों में उतरते हुए उन्होने धाराप्रवाह बोलना क्या शुरू किया, लगा कि मैं भी टाइम मशीन में बैठ कर उस काल खंड में पहुंच गया। निरंतर जारी…..(To be continued ….)

PART – 2 WILL BE PUBLISHED ON 23.01.20212

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मेरी नियुक्ति लेह लद्दाख की बर्फीली वादियों में हुई थी जहां पर तापमान  शून्य से 40 डिग्री नीचे चला जाता है और विभिन्न प्रकार के रोगों व भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहां पर पानी पीने को नहीं मिलता है । बर्फ ही बर्फ होती है ।खाना बनाना मुश्किल और उसको तरह से मुंह पर पहुंचाना मुश्किल । यदि हाथ में हल्की सी  भी ग्रीस लग जाए तो हाथ फूल कर दुगना तिगुना हो जाता है। अगर टेंट से बाहर निकल कर बर्फ को निहार लिया और यदि सूरज निकला हुआ है तो अंधा होने का भी खतरा है ।वहां पर सबसे बड़ी चुनौती है अपने आप को जिंदा रख पाना और अपने किसी अंग को कटने से रोक पाना।

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Bite of ice / बाइट ऑफ आइस

“बाइट ऑफ आइस” अर्थात “बर्फ  का काटना”  वह बीमारी है जिसमें पैर पर एक काला  चकत्ता अर्थात धब्बा दिखाई देता है और उसे तुरंत काट के शरीर से अलग ना कर दिया जाए तो वह बढ़ता जाता है और शरीर मरता जाता है । यानी जितना लेट करोगे उतना ही पैर ज्यादा ऊंचाई से कटेगा ।  बिना दुश्मन से लड़े अपना पैर कटवा देना या अपनी जान गवा देना, जीवन को व्यर्थ करना सा लगता है । “फ्रॉस्टबाइट” अर्थात “बाइट ऑफ आइस” एक चोट है जो त्वचा की ठंड और अंतर्निहित ऊतकों के कारण होती है। पहले आपकी त्वचा बहुत ठंडी और लाल हो जाती है फिर सुन्न कठोर और पीला हो जाता है। फ्रॉस्टबाइट उंगलियों पैर की उंगलियों, नाक कान गाल और ठोड़ी पर सबसे आम है। ठंड में हवा का सामना करना हवा का मौसम ठंढ से सबसे ज्यादा कमजोर होता है

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वहां बहुत से लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से जूझते हैं । सांस लेने में कठिनाई  अस्थमा पाचन की समस्या, गंभीर पेप्टिक व जानलेवा पेप्टिक अल्सर आदि आदि ना जाने कितने रोग हैं। जब टेंट से बाहर निकल कर देखते हैं तो एक पल जबरदस्त खूबसूरती लगती है कि मानव स्वर्ग में आ गए हों और दूसरे ही पल लगता है जैसे यह बर्फीली पहाड़ियां मौत की सौदागर हों और हमारी तरफ झपट रहे हों। चारों तरफ मौत का तांडव सा होता दिखाई देता है। यह उसी तरह लगता है जैसे आपकी हसीन प्रेमिका एक पल लुभाती है और दूसरे ही पल लुटेरी दुल्हन बनकर आपको जान से मार कर और आपका सारा सामान लूट कर चली जाती है और आप ठगे से रह जाते हैं समझ ही नहीं पाते।

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वहां बहुत से लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से जूझते हैं । सांस लेने में कठिनाई  अस्थमा पाचन की समस्या, गंभीर पेप्टिक व जानलेवा पेप्टिक अल्सर आदि आदि ना जाने कितने रोग हैं।

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जब टेंट से बाहर निकल कर देखते हैं तो एक पल जबरदस्त खूबसूरती लगती है कि मानव स्वर्ग में आ गए हों और दूसरे ही पल लगता है जैसे यह बर्फीली पहाड़ियां मौत की सौदागर हों और हमारी तरफ झपट रहे हों। चारों तरफ मौत का तांडव सा होता दिखाई देता है। यह उसी तरह लगता है जैसे आपकी हसीन प्रेमिका एक पल लुभाती है और दूसरे ही पल लुटेरी दुल्हन बनकर आपको जान से मार कर और आपका सारा सामान लूट कर चली जाती है और आप ठगे से रह जाते हैं समझ ही नहीं पाते।

मुझे लगा कि मैं परम भाग्यशाली व्यक्ति हूं जो इन सभी तमाम जानलेवा परेशानियों से जूझ कर भी जिंदा हूं । परंतु विधाता को ना जाने क्या मंजूर था और भाग्य में ना जाने क्या लिखा था ।एक दिन अचानक तेज सर दर्द हुआ और जो बढ़ता ही गया और कुछ ही मिनटों में मैं गिरकर बेहोश हो गया ।अब मेरे साथी जवानों के सामने एक बहुत गंभीर समस्या आ गई कि मुझे बेस कैंप कैसे ले जाया जाए क्योंकि खतरनाक तथा मौत का पर्याय बनी बर्फ पर एक कदम चल पाना भी अत्यंत कठिन कार्य होता है । खैर जो भी हो मुझे जैसे तैसे नीचे पहुंचाया गया । सेना के हॉस्पिटल में मेरा इलाज हुआ ।उन्होंने मुझे जिंदा तो बचा लिया परंतु मैं अब ऐसी समस्या में फस गया जिससे तो मर जाना ही सही लग रहा था। हुआ यह था कि अत्यंत निम्न तापमान पर मेरे दिमाग में रक्त वाहिकाएं सिकुड़ गई थी और उनमें ऑक्सीजन न पहुंचने के कारण दिमाग का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था।

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डॉक्टरों की  मेहनत का परिणाम यह हुआ कि मैं जिंदा था, दैनिक कार्य करने में सक्षम था, परंतु मेरे दिमाग पर हल्का सा जोर पड़ते ही मैं अपनी सुध बुध खो बैठाता था। मैं खतरनाक हो गया था मुझे किसी की बातें नहीं सुहाती थी । मैं मेरे हाथ में जो चीज होती थी उसे फेक कर मारता था। मैं बात बात में उग्र हो जाता था और मारने-पीटने को तैयार हो जाता था । इस बुरे दौर में सब ने मुझ से दूरी बना ली थी। लोगों में बात फैल गई थी और लोगों ने व रिश्तेदारों ने मुझसे ही नहीं मेरे घर से भी दूरी बना ली थी।  मेरे रिश्तेदार तक मुझसे खतरा समझने लगे थे। लोग आपस में बात करते थे कि यदि आप अपनी सलामती चाहते हो तो उस घर के पास मत जाना क्योंकि उस घर में एक पागल फौजी रहता है। 

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सरहद पर शहीद हो जाते तो अच्छा था। दुश्मन की गोली खा कर मर जाते तो ही अच्छा था । कुछ काम तो आ जाते इस देश के लिए । यूं घुट-घुट कर तड़पकर बदनाम तो ना न होते ।
सबसे सही बात थी तो सिर्फ यह  मेरी पत्नी मेरे साथ थी ।और ना जाने क्यों मेरे पत्नी के प्रति मेरा व्यवहार बिल्कुल सही था। शायद वह उसकी श्रद्धा समर्पण और मेरे पागलपन के प्रति उसकी सहनशीलता थी । वह महान है जिसने मुझे जीवन के उन कठिन पलों में संभाला जहां पर मैं हमेशा के लिए पागल खाने की ऊंची दीवारों के बीच घुटन भारी  कालकोठरी के अंदर हमेशा के लिए गुम हो जाता।

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मेरा उपचार मनोचिकित्सक के द्वारा किया जा रहा था और मुझे सुबह से शाम तक बहुत सी दवाइयाँ खानी पड़ती थी। कई साल तक यह क्रम चलता रहा और मैं मेरी स्थिति ठीक होने की वजह लगातार ही चली गई अब मुझे जिंदगी में पूर्ण अंधेरा नजर आने लगा था। मेरा मुझ पर भी अधिकार नहीं था मेरा व्यवहार मेरे भी समझ से बाहर था । सब मुझसे डरने लगे थे। मेरा किसी से भी मिलना जुलना भी बंद हो चुका था और इस दुनिया में मेरी पत्नी के सिवा मेरा कोई नहीं था। मुझे धीरे-धीरे महसूस होने लगा था कि दवाइयां लेने के पश्चात मेरा स्वास्थ्य और बिगड़ जाता है और मेरी पीड़ा बढ़ जाती है और मुझे घुटन होने लगती है । जब ऐसा मैंने लंबे समय तक महसूस किया तो मैंने एक दिन सारी दवाइयां  उठाकर घर के पिछवाड़े  की दीवार से बाहर दी, यह सोच कर कि मरना तो ऐसे भी है और मरना तो वैसे भी है तो क्यों इन दवाइयों की घुटन में पिस पिस कर मरा जाए ।

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जैसे ही दवाई की खुराक का समय मैंने जाने दिया तो मुझे अलग प्रकार की तकलीफ होने लगी, क्योंकि मैं उन गोलियों दवाइयों का शिकार हो चुका था । मुझे उन गोलियों दवाइयों की आदत पड़ चुकी थी मैंने मन में हिम्मत करके सोचा की दुनिया में कोई तो उपाय होगा। मैंने सोचा कि यदि इस दुनिया में भगवान नाम की कोई चीज है तो अध्यात्मिक मार्गों पर चलने पर बड़े-बड़े चमत्कार होने की सूचनाएं भी है , तो क्यों न उन्हें आजमाया जाए । मैंने अपने दिमाग पर बहुत अधिक नियंत्रण रखा और दवाइयों की बजाये मैंने अपने मनोबल को हथियार बनाया । मनोबल ही मेरी दवाई थी। 

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 भयंकर पीड़ा से गुजरता था, पर सोचा कि जो भी होगा देखा जाएगा अब मैंने आध्यात्मिक गुरु की तलाश शुरू कर दी थी । सबसे पहले मैं एक गुरु के पास गया और सीधा सवाल किया कि क्या आप मुझे भगवान से मिलवा सकते हो । तो उन्होंने घुमा फिरा कर उत्तर दिया मुझे पता चल गया कि इन तिलों में तेल नहीं है फिर मैंने एक और गुरु के बारे में सुना कि वह मानसिक रोगों का भी उपचार करते हैं। मैंने तुरंत उनसे मिलने का फैसला किया क्योंकि एक समय ही था तो मेरे पास नहीं था। मैं भयंकर पीड़ा से गुजर रहा था। उस संस्था के स्वागत कक्ष पर गया और अपना पूर्ण परिचय दिया तो मुझे अंदर जाने की अनुमति मिली। अंदर जाकर देखा तो बड़ा विचित्र सा माहौल था।

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 एक बड़ा सा हॉल था, जिसमें बहुत ही हल्की रोशनी थी तथा धीमा धीमा मनमोहक संगीत बज रहा था । वहां पर मुझे उस संस्था के प्रधान अर्थात गुरु के सामने पेश किया गया । इसी दौरान मुझे यह देखने को भी मिला कि वहां पर बहुत से पुरुष और स्त्रियों के जोड़े एक दूसरे से लिपटे चिपके हुए संगीत की धुन पर धीमे धीमे नृत्य  कर रहे थे । यह भी देखा कि जैसे ही कोई नई स्त्री आती है तो वह किसी भी पहले से खड़े अकेले अजनबी  पुरुष के साथ अपना जोड़ा बना लेती हैं । इसी प्रकार से यदि कोई नया पुरुष वहां पर आता है तो पहले से खड़ी अजनबी अकेली स्त्री के साथ जोड़ा बना लेता है। यानी किसी भी पुरुष व स्त्री को किसी भी पुरुष व स्त्री के साथ नृत्य करने की छूट वहां पर थी ।

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 मेरा माथा ठनका मुझे लगा कि वह कोई आध्यात्मिक केंद्र ने होकर व्यभिचार का केंद्र है । फिर भी मैंने अपने ऊपर नियंत्रण बनाए रखते हुए  उनसे पूछा कि “क्या आप मुझे भगवान से मिलवा सकते हैं।” तो उन्होंने कहा कि “हां जरूर मिल जाएंगे।” मैंने कहा कैसे तो उन्होंने कहा कि “आप रोज हमारी संस्था में आइए और जो सामने प्रक्रिया चल रही है आप भी उसे अपनाये।” तो यह बात सुनकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। पागलपन के तो वैसे भी मुझे दौरे पड़ते ही थे। गुस्सा वैसे भी नियंत्रण से बाहर हो ही जाता था ।  मैने उनके गुरु से मैंने तेज आवाज में बहस करना शुरू कर दिया कि आपने यह क्या किस चीज का अड्डा बना रखा है और मैंने एक कुर्सी उठाकर फेंक दी व एक मेज को पलट दिया ।

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वह मुझे अपने तर्कों से समझाने लागा लेकिन मुझे तो समझना ही नहीं था ना, क्योंकि मुझे वह कोई आध्यात्मिकता का प्रचार नहीं लगा बल्कि अपनी काम काम कुंठाओं  को निकालने का एक माध्यम लगा, जिसमें आने वाले लोग ऊंची सोसाइटी के लोग थे।  मैं उन लोगों पर बरस गया कि तुरंत बंद करो ये सब और बाहर निकल जाओ । कुछ लोग दरकार भाग गए व कुछ लोग कोनों में  सिमट गये।  मैं उस तथाकथित गुरु की गर्दन पकड़कर गुस्से मे बोला कि तुम क्यों धर्म व अध्यात्म के नाम पर इस तरह की बुरी चीजों को चला रहे हो व उनका मार्ग  प्रशस्त कर रहे हों।  मेरी उग्रता देखकर ज्यादा किसी ने  बगल में ही स्थित पुलिस चौकी में फोन कर दिया था तो तुरंत ही चार  पुलिस वाले आ गए और मुझे जैसे तैसे समझा-बुझाकर  कि चलो एक बार थाने में बात करते हैं, कहकर थाने ले आए। 

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वहां मुझे इंस्पेक्टर साहब के सामने पेश किया गया। इंस्पेक्टर साहब ने बोला कि क्या गुंडागर्दी मचा रखी है। आप किसी के घर में किसी की संस्था में घुसकर इस तरह से अव्यवस्था नहीं फैला सकते। मुझे गुस्सा तो चढ़ा ही हुआ था। मैंने भी जोश में बोला “इंस्पेक्टर साहब आप क्या बात कर रहे हैं? वह कोई गुरु नहीं है। उसने लोगों की कामेच्छा की काम कुंठाओं को दूर करने के लिए, कामेच्छा पूर्ति करने के लिए एक माध्यम बना रखा है” । इस्पेक्टर साहब ने अपनी मजबूरी जताते हुए  कहने लगे और मुझे समझाने लगे कि “देखो भाई आपको तो काफी कुछ पता चल ही गया है, परंतु असली बात मैं बताता हूं कि यहां पर जो हाई सोसाइटी के और कुछ उच्च पदों पर बैठे लोग जो आते हैं । वे  मेरे से तो बहुत बहुत ऊंचे ऊंचे पदों पर हैं और विभिन्न विभागों के हैं । इसलिए मेरा तो उन पर कोई बस नहीं है। और आपको भी यह सलाह है कि इससे आपको व्यक्तिगत परेशानी तो है नहीं, इसलि‍ए नजरअंदाज  किजिएगा तो आपके लिए तथा मेरे लिए दोनों के लिए ही बेहतर होगा।”

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अब  इस्पेक्टर साहब ने मुझे यह पूछा कि आप उस बेकार की जगह गए ही क्यूँ थे तो मैंने  इस्पेक्टर साहब को मेरी समस्या के बारे मे  बताया । उन्होंने मुझे काफी देर समझाया बुझाया, चाय पानी पिलाया और दोस्ताना लहजे में समझाते हुए कहा कि फौजी साहब हमें आप पर गर्व है कि आप हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं । जब मैं आपको यह जो बीमारी है वह हम देश के नागरिकों की रक्षा करते हुए मिली है तो हम भी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हमारी आपकी बीमारी जल्द से जल्द छूट जाए और आप को वास्तव में कोई योग्य गुरु मिले जो इस पीड़ा से आप को मुक्त कराने में सहायक हो ।  मुझे भी उनके निर्मल व मित्रवत व्यावहार औऱ वास्तविकताओं की मजबूरी के मद्देनजर शांत होना पड़ा ।

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अब मेरे सामने था तीसरा गुरु ।
मैं पहुंच गया अब तीसरे गुरु के पास और मेरा वही प्रश्न दोहराया कि “मान्यवर क्या आप मुझे भगवान दिखा सकते हैं ।” उन्होंने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया “बेटा जरूर दिखा सकते हैं, पर उसके लिए तुम्हारी प्रबल इच्छा शक्ति होनी चाहिए।” मैंने कहा साहब “मैं फौजी हूं और पागल हो चुका हूं। पर अपने मनोबल से उस पागलपन को कंट्रोल में करने की कोशिश कर रहा हूं।
पागलखाने में भर्ती होने से अच्छा तो कुछ भी है। मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूं ।” उन्होंने मुझे अगले दिन सुबह का मुझे का समय दिया और मैं समय से पहले ही पहुंच गया ।

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उन्होंने मुझे कुछ सामन्यत योगिक क्रियाएं, कुछ ध्यान की प्रक्रिया सिखाने शुरू कर दी । मुझे भी उनकी बातों में, उनके तर्कों में दम लगा उनका आभामंडल भी मुझे प्रभावित करता था ।  मुझे धीरे-धीरे उन प्रक्रियाओं से अच्छा लगने लगा और भवन की  कृपा से आज देखिए,  उन बातों को शायद  2 साल हो चुका है और मैं पूर्ण ठीक हो चुका हूं और आपके सामने हूँ । मुझे कोई भी कुछ भी कहे, गालियां भी देवे, किसी भी प्रकार का बुरे से बुरा वाक्य कहे तो भी मुझे गुस्सा नहीं आता । मुझे मेरे मन में सदा एक परम आनंद महसूस होता रहाता है।अब मैं किसे किसी बुरे व्यक्ति की बुरी बातों का जवाब देकर अपना आनंद कम नहीं करना चाहता। मुझे ईश्वरीय सत्ता का एहसास हो चुका है। मेरी आत्मा की ऊर्जा ईश्वरीय ऊर्जा के संपर्क में आने लगी है। मैं सदैव ईश्वर या चमत्कार का धन्यवाद देता हूं तथा हमेशा लोगों की मदद करने के लिए तत्पर रहता हूं । किसी को किसी भी प्रकार की मदद चाहिए होती मैं सदैव उसके लिए प्रस्तुत हो जाता हूं । औऱ अब देखिए, मैं आपके सामने हूं, वही “पागल फौजी”

उन्होंने मैंने मुस्कराते हुए कहा कि कौन पागल फौजी मुझे तो आप एक संत महात्मा की तरह दिखाई पड़ते हैं । आपका अब हम मंडल मुझे बड़ा ही प्रभावित कर रहा है । आप दुनिया के लिए चाहे वह भौतिक संसार हो या अध्यात्मिक जगत हो, के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो। मैं कभी ना कभी, किसी न किसी माध्यम से आप की यह कहानी विश्व के समस्त व्यक्तियों तक पहुंचाने की जरूर कोशिश करूंगा ताकि वह भी समझें कि यहां पर ढोंगी बाबाओं के बीच में सनातन धर्म के असली संत भी मौजूद हैं, जो अपनी छोटी-छोटी क्रियाओं के माध्यम से असाध्य रोग को भी दूर कर सकते हैं और एक आदमी को परम आनंद की अवस्था में पहुंचा सकते हैं । आप तो अध्यात्मिक व भौतिक जगत दोनों के लिए एक जीता जागता प्रमाण हैं। वह पागल फौजी आज भी जीवित हैं और जान कल्याण में लगे रहते है और उनके स्वस्थ रहने की कामना करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्होंने इस पर जीत हासिल कर ली है । हाँ भगवान उन्हें दीर्घायु प्रदान करे, ना केवल उनके स्वयंसेवक के लिए बल्कि हमारे समाज का मार्गदर्शन करने व हमारी मदद करने के लिए भी। वो आज भी पागल ही हैं क्योंकि आजकल निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले को लोग पागल ही कहते हैं । मेरा उनको शत शत नमन व आभार।

I समाप्त I

लेखक कहानी का किसी भी सच्ची घटना से अथवा किसी वास्तविक जीवित या मृत व्यक्ति से किसी प्रकार का कोई संबंध का दावा नहीं करता यह कहानी मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से है और इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या संस्था आदि की भावनाओं को आहत करने का नहीं है। यदि किसी को इस कहानी के किसी भी हिस्से से पर आपत्ति हो तो, वे इस ब्लॉग के कमेंट बॉक्स बॉक्स में अपनी आपत्ति दर्ज करें।आपत्ति सही पाए जाने पर कहानी पर उस हिस्से को  कहानी से हटा दिया जाएगा।

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